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अंग्रेज लेखकों को पैसे देकर लिखवाया कुछ असामाजिक तत्वों ने मनचाहा झूठा इतिहास #जाट #सिनसिनवार#भरतपुर #Jat #Sinsinwar #Maharaja_surajmal #Lohagadh #Akashdeep #Akashdeep_sinsinwar

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 आज यदि कोई भी लेखक कुछ भी लिख दे या किसी अंग्रेज लेखक से पैसे देकर कुछ भी पुस्तक लिखवा लें उसमें तथ्यों को तोड़ें मरोड़ें , तो सौ पचास साल बाद लोग उसको महत्व देंगे असामाजिक लोगो ने ऐसा ही किया है ज्यादातर स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के लिए  , यही इतिहास के साथ हुआ है समाज को तोड़ने वालों ने यही कार्य तो किया है , भरतपुर के जाट या ज्यादातर जाट स्वयं को राजा होते हुए भी किसान कहते आये हैं और वास्तविकता में जाट है भी किसान देश की रीढ़ , इसी रीढ़ पर आघात करने का कार्य बर्तमान में किया जा रहा है नही तो क्या आवश्यकता थी इन सव वातों की यह सव राजनीति है , सिनसिनवार जाट हैं यदुवंशी हैं , निकास भी यदुवंश से है चिंता की कोई बात ही नही है कोई कुछ कहता रहे कहे समाज का शिक्षित वर्ग जानता व समझता है इन चालों को ,  इन अंग्रेजो के इतिहासकारों के समकक्ष राजपरिवारों के स्टेटमेंट मायने रखते हैं जो कहीं देखने को नही मिलते क्योंकि इनखरीदे हुए  इतिहासकारों का कोई महत्व नही था न इनकी औकात थी कि ये समाज पर उंगली उठा सकें इनका सिर्फ यूज किया गया भविष्य के लिए किया गया है , किले में लगा महाराजा जवाहर ...

मेरे सपने Aakashdeep sinsinwar

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  दर से दर तक गए होंगे कितने बेखबर रहे होंगे हिसाबों की दुनिया में बेहिसाब रहे होंगे  अपने चंद मरे होंगे  किस तरह जिये होंगे  बीघा भर खेत भी हल से जुते होंगे  गांव से शहर तक पैदल ही गए होंगे  पैर जले होंगे छाले भी पड़े होंगे  दर से दर तक गए होंगे कांटे भी लगे होंगे  किसी का पुत्र किसी का पिता  भाई पति न जाने कितनी लाचारियां रही होंगी  उलझनों में कुछ कश भी लिए होंगे  नफरतों में पल दो पल जिये होंगे  शहर से लौटे होंगे थक गए होंगे  जाम आंसुओ के आंखों ने पिये होंगे  सपने मेरे आंखों ने जिये होंगे  उठ खड़े होंगे दौड़ पड़े होंगे  जो नही हैं साथ बो साथ खड़े होंगे  मेरेसपने कितने खुश नसीब रहे होंगे कुए के अंदर कुए रहे होंगे  सपने मेरे कितने गहरे रहे होंगे वूंद वन नदियों में गिरे होंगे  नदियों संग समंदर तलक गए होंगे  बड़े बेचैन रहे होंगे  उम्र भर साथ रहे होंगे उठ खड़े होंगे दोवारा जुट पड़े होंगे दोवारा  हादसों में मेरे कब ये  हादसे होंगे  सपने मेरे कब सच साथ से होंगे  कब इक  ...

आखिर कितना मुश्किल है Akashdeep sinsinwar

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 आकाशदीप सिनसिनवार 10 /05/2021 ☺❤

ब्रज के राजा सूरजमल Aakashdeep sinsinwar

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  भाइयो मेरी अव तक कि लिखी जिसे में सबसे अच्छा मानता हूं आपको शेयर कर रहा हूं कुछ गलतियां हो तो माफ करे सच्चाई है ❤️❤️🙏🙏🙏🙏🙏 आकाशदीप सिनसिनवार  आजऊ गांव तहशील कुम्हेर जिला भरतपुर जय महाराजा सूरजमल  8290336052 ब्रज के राजा सूरजमल 🙏🙏🙏🙏🙏😊😊 जाट वीर सूरज के हम वंशज उत्तर में फैली धाक हमारी  राजा सूरजमल जाट हमारे जैसे स्वयं श्री कृष्ण ब्रजराज पधारे   राजपाट खातिर हिन्दू से हिन्दू लड़वाया था  अब्दाली  तव न्योतो से जयचंदो ने बुलवाया था   धर्म की हानि खातिर  अब्दाली ने हिन्दू हीन किया   मंदिर तोड़े बच्चे मारे साधु संत औरत सव का कुदीन किया अकेला जाट खड़ा धर्म की खातिर मथुरा में  छाती पर खाये घाव  कयी न मिले मराठे रजवाड़े साथ कहीं तव जाके कहलाया था अंतिम हिंदू सम्राट सूरजमल सिनसिनवार कहीं  एक अकेले जाटों ने कट कट कर बलिदान दिया    हिन्दू धर्म की खातिर अड़ियल जाटों ने मृत्यु को स्वीकार्य किया    श्री कृष्ण के वंशज पर न कोई भी वार हुआ    छलिया के प्रकोप से अब्दाली,  खुद हार गया...

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 आकाशदीप सिनसिनवार 26/07/2019 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 15 के बाद 16 संस्कार में 16 श्रृंगार में  लोगों की खामोशी में उनके पैरों की थापों में  रूदानी फुसफुसाहट में राम नाम के सत्य में  जैसे उसके बोल हो बोले कानों में दहाड़े हैं  बूढ़ी मां की चीखें मेरी सांसो में चिंघाडे हैं  जैसे कोई काम अब भी अधूरा फैल गया  अब तुम छोड़ो क्यों रोतेहो वो तो अपने धाम गया दिल रोया या मन रोया या अपनी औकात देख ये चित रोया  खामोशी नाच रही हो जैसे इस नश्वर के आंगन में  सूखा अकाल पड़ गया हो जैसे भादो बसंत और सावन में  गुलाब थे जो तोड़े  गए महक बिखेरे जाने को    वो मीठी यादों की चहक बिखेरे जाने को   मेहमानों के जाने से कौन भला यूं रोता है     उनका जाना निश्चित था तेरा जाना निश्चित है      फिर क्यू  खुद को तू भिगोता है     खुशी मना ओ नश्वर प्राणी बर्षो बाद      बड़ा दिन शुभ आया      पंद्रह के बाद आज, बड़ा संस्कार सोलह आया       दे...

मेरी पहली पंक्ति 🙏❤️

 ❤️मेरी पहली पंक्ति❤️ क्या कहूंमें अपने बारे में  में खुद से बाहर नही निकल पाया हूँ  वह बात भी क्या अजीव सी थी  सब कहते थे  तुम में एक संसार बसा है  तुम खुद को जानो पहचानो  क्या कहूँ में अपने बारे में  में संसार में गुम सा गया हूँ ये जो शौक थे जो कुछ विरासत में आये मुझमे  ये मेरे तीर थे तलबार थे   अब चुभते बहुत है जो   ये तीर थे तलबार थे जो   विरासत में आये मुझमे  कागजो पर लिखे हुए जमाना हुआ  ऐसा भी नही की स्याही ना हो  सारा मन का खेल था  अब जैसे मन का भी मन न हो  कोई सुने कोई पढे या कोई पहचाने मुझको  उससे मेरी बात ये कहना अब तो बहुत देर हो गयी  जाने, अनजाने अब तू न जाने मुझको    बात तुम्हारी मानी हमने    हम अपने संसार में तो हैं    चुभते हैं तीर तलबार बहुत  मगर फिर भी हम अपने मयान में तो हैं    पहली पंक्ति तुम मत पढ़ना  में झूठा साबित हो जाऊंगा  पढलो समझो तो फिर मत कहना  में खुद से बाहर निकला था  जैसे दूध हो केसर का सोने सा ...