आखिर कितना मुश्किल है Akashdeep sinsinwar

 आकाशदीप सिनसिनवार 10 /05/2021

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आखिर कितना मुश्किल है

 आकाश हो जाना 

 विराट होकर शून्य हो जाना 

 आखिर कितना मुश्किल है

  बसुधा हो जाना 

  संसार को खुद में समा लेना बिजली आँधी सुनामी

 प्रकृति मानव सबके हर घाव को सह जाना 

 आखिर कितना मुश्किल है 

 शिव की कालजयी तीसरी आंख से 

कामदेव का मर जाना 

आशुतोष के प्रिय त्रिशूल से 

 प्रिय गणेश का सर कट जाना 

आखिर कितना मुश्किल है 

गौरी का पुत्र शोक को सहजाना 

विष्णु ने कई अवतार लिए 

मानव के उद्धार किये 

आखिर कितना मुश्किल है 

वृंदा के श्राप से विष्णु का  

श्री विहीन हो जाना 

आखिर कितना मुश्किल है 

इच्छामृत्यु पाकर भी मृत्यु शैया पर सो जाना 

पिता न होकर भी सबके पितामह हो जाना 

आखिर कितना मुश्किल है 

अयोध्यापति होकर भी वनवासी राम हो जाना 

आखिर कितना मुश्किल है पन्ना का कुल की जान बचा जाना

देवों के बीच मानव का स्वाभिमान बचा जाना

शून्यता में ही नभ का प्रताप छिपा 

समय ने बसुधा के घाव भरे 

आंख तीसरी मन की थी  अपने अंदर के संयम की थी 

प्रिय त्रिशूल से वार हुआ कुछ अच्छा होना प्रकृति थी 

गज का  शीश लगा जब से गजानन का होना नियति थी 

इतना आसान कहाँ होगा आशुतोष का रुद्ररूप  अपना जाना

इतना आसान कहाँ होगा वृंदा का तुलसी

 विष्णु का शालिग्राम हो जाना 

नारायण का श्री से श्रीविहीन हो जाना 

मानवता के उद्धार लिए विष्णु ने दशावतार लिये 

इतना आसान कहाँ होगा मानवता के मर जाने पर अपने अंशो के संहार लिए कल्कि का अवतार लिए 

नारायण को आना होगा सुदर्शन चलाना होगा 

गांगेय पुत्र होने पर भी एक तीर का अभिशाप लिए

 कई तीरो पर सो जाना 

आसान कहाँ होगा भीष्म का निर्विवाह  पितामह हो जाना

आसान कहाँ होगा दशरथ के वचनों का भार लिए जी लेना 

पन्ना का त्याग मीरा का विषअमृत समझ के पी लेना 

इतना आसान कहांहोगा 

आदमी होकर आदमी का न होना 

नियति है निश्चित है सब नारायण का रचित है सब 

शून्य भी शिव पूर्ण भी शिव 

अनिश्चित निश्चित अपूर्ण भी शिव 

आखिर कितना मुश्किल है महेश्वर का महादेव हो जाना

असुरों सुरों का ईश हो जाना ...

आकाशदीप सिनसिनवार 

10/05/2021

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