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आकाशदीप सिनसिनवार 26/07/2019
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15 के बाद 16 संस्कार में 16 श्रृंगार में
लोगों की खामोशी में उनके पैरों की थापों में
रूदानी फुसफुसाहट में राम नाम के सत्य में
जैसे उसके बोल हो बोले कानों में दहाड़े हैं
बूढ़ी मां की चीखें मेरी सांसो में चिंघाडे हैं
जैसे कोई काम अब भी अधूरा फैल गया
अब तुम छोड़ो क्यों रोतेहो वो तो अपने धाम गया
दिल रोया या मन रोया या अपनी औकात देख ये चित रोया खामोशी नाच रही हो जैसे इस नश्वर के आंगन में
सूखा अकाल पड़ गया हो जैसे भादो बसंत और सावन में
गुलाब थे जो तोड़े गए महक बिखेरे जाने को
वो मीठी यादों की चहक बिखेरे जाने को
मेहमानों के जाने से कौन भला यूं रोता है
उनका जाना निश्चित था तेरा जाना निश्चित है
फिर क्यू खुद को तू भिगोता है
खुशी मना ओ नश्वर प्राणी बर्षो बाद
बड़ा दिन शुभ आया
पंद्रह के बाद आज, बड़ा संस्कार सोलह आया
देख जिंदगी धूल हुई अब सोच भला क्या भूल हुई
काल चक्र के पहिये में पिस जाना ही जीवन है
यादों में सबकी इकपल में भ्रमण कर जाना ही जीवन है
जल जाना ही जीबन है
मर जाना ही जीवन है
जो होगा वो होना ही है तू मुख्यधारा का प्रतीक बन
तू वीर बन तू नीर बन अंधी आंखों की तकदीर बन
सब के कष्टो को हर ले तू वो तप्ती शमशीर बन
असली जीवन वो जीवन जो मौत के बाद पले
16 के बाद 1 बन तू या अनेकों में नेक बन तू
मर जाना ही जीवन है पागल
जल जाना ही जीवन है
राम नाम का सत्य शिव का में मिल जाना ही जीवन है
((((आकाशदीप सिनसिनवार ))))26 /07/2019
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